Tuesday, 10 May 2011

[Satsang] दलितोद्धारक शुद्र कुलोत्पन्न भगवद अवतार- देवर्षि...

Swami Pranavanand posted in Satsang
दलितोद्धारक शुद्र कुलोत्पन्न भगवद अवतार- देवर्षि नारद और महर्षि वेदव्यास.          भगवान के २४ अवतार हुए है.वे सभी मानव जाती के उद्धार के लिए ही हुए है.परन्तु उन में तीसरा और सत्रहवा अवतार दलित कुल मे ही हुआ है.स्वयं नारद जी अपने आत्म चरित्र में कहते है.अहम् पुरातित भवे  मुने दास्यास्तु कस्याश्चन वेद वादिनाम .....मै एक घरो में काम करनेवाली दासी का पुत्र था.बाल्यावस्था में ब्राह्मणों ने मुझे संतो की सेवा में नियुक्त किया.यहि नारद जी भगवन के  १७ वें अवतार  है. देवर्षि नारद जी जैसा दूसरा कोई ऋषि हिन्दू धर्म में नही हुआ है. उनका देवता,मनुष एवं असुर भी सम्मान करते थे. वे एक शुद्र कुल मे ही पैदा हुए थे.उन्होंने दलितों,स्त्रियों आदि सभी का उद्धार करने के लिए बहुत प्रयत्न किये है.उन्होंने सनकादी ऋषियों का कहा था.भक्तिग्यांविरागानान सुखन .......स्थापनं सर्व वर्नेसू.मै  भक्ति,ज्ञान आदी को चारो वर्णों में फैलाना चाहता हूँ.         १७ वे अवतार दलित जाती की महान मनीषी मत्स्य गंधा के सुपुत्र थे.उन्होंने तो स्पष्ट रूप से घोषणा की थी की स्त्रिशुद्र द्विज्बंधुनान श्रेय एव भावेदिह ..स्त्रि शुद्र आदि का विकास कैसे हो? उन्होंने १८ पुराण ,महाभारत की रचना की और एक दलित रोम्हर्शन को महाभारत और १८ पुरानो का आचार्य बना दिया.इतिहास पुराणानां पिता में रोम्हर्शन..पहले प्रनवात्मक एक ही वेद था.उन्होंने ही वेद के चार भाग किये और उनके चार नाम रखा दिए.इसीलिए वे महर्षि वेद व्यास कहलाये. महर्षि वेदव्यास आधुनिक हिन्दू धर्म के शिल्पी है.उन्होंने ही वर्ण वाद के मकडजाल से निकाल कर हमें भगवद तत्त्व में प्रतिष्ठित किया.आज जो भी कुछ  बचे हुए है वह महर्षि वेदव्यासजी के ही कारण है.आज हम लोग महर्षि वेदव्यास के  ही शुभ संकल्प को आगे बडा रहे है.
Swami Pranavanand 10 May 12:52
दलितोद्धारक शुद्र कुलोत्पन्न भगवद अवतार- देवर्षि नारद और महर्षि वेदव्यास.
भगवान के २४ अवतार हुए है.वे सभी मानव जाती के उद्धार के लिए ही हुए है.परन्तु उन में तीसरा और सत्रहवा अवतार दलित कुल मे ही हुआ है.स्वयं नारद जी अपने आत्म चरित्र में कहते है.अहम् पुरातित भवे मुने दास्यास्तु कस्याश्चन वेद वादिनाम .....मै एक घरो में काम करनेवाली दासी का पुत्र था.बाल्यावस्था में ब्राह्मणों ने मुझे संतो की सेवा में नियुक्त किया.यहि नारद जी भगवन के १७ वें अवतार है. देवर्षि नारद जी जैसा दूसरा कोई ऋषि हिन्दू धर्म में नही हुआ है. उनका देवता,मनुष एवं असुर भी सम्मान करते थे. वे एक शुद्र कुल मे ही पैदा हुए थे.उन्होंने दलितों,स्त्रियों आदि सभी का उद्धार करने के लिए बहुत प्रयत्न किये है.उन्होंने सनकादी ऋषियों का कहा था.भक्तिग्यांविरागानान सुखन .......स्थापनं सर्व वर्नेसू.मै भक्ति,ज्ञान आदी को चारो वर्णों में फैलाना चाहता हूँ.
१७ वे अवतार दलित जाती की महान मनीषी मत्स्य गंधा के सुपुत्र थे.उन्होंने तो स्पष्ट रूप से घोषणा की थी की स्त्रिशुद्र द्विज्बंधुनान श्रेय एव भावेदिह ..स्त्रि शुद्र आदि का विकास कैसे हो? उन्होंने १८ पुराण ,महाभारत की रचना की और एक दलित रोम्हर्शन को महाभारत और १८ पुरानो का आचार्य बना दिया.इतिहास पुराणानां पिता में रोम्हर्शन..पहले प्रनवात्मक एक ही वेद था.उन्होंने ही वेद के चार भाग किये और उनके चार नाम रखा दिए.इसीलिए वे महर्षि वेद व्यास कहलाये. महर्षि वेदव्यास आधुनिक हिन्दू धर्म के शिल्पी है.उन्होंने ही वर्ण वाद के मकडजाल से निकाल कर हमें भगवद तत्त्व में प्रतिष्ठित किया.आज जो भी कुछ बचे हुए है वह महर्षि वेदव्यासजी के ही कारण है.आज हम लोग महर्षि वेदव्यास के ही शुभ संकल्प को आगे बडा रहे है.

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